क़ज़ा होते हुए नफ़्ल पढ़ना

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*🥀 क़ज़ा होते हुए नफ़्ल पढ़ना 🥀*



*जब ख़लीफ़ए रसूलुल्लाह ﷺ सय्यिदुना स़िद्दीक़े अकबर رضی الله عنہ की नज़अ़् का वक़्त हुवा अमीरुल मुअ्मिनीन फ़ारूक़े अअ़्ज़म رضی الله عنہ को बुला कर फ़रमाया ऐ उ़मर! अल्लाह से डरना और जान लो कि अल्लाह के कुछ काम दिन में हैं कि उन्हें रात में करो तो क़ुबूल न फ़रमाएगा और कुछ काम रात में कि उन्हें दिन में करो तो मक़बूल न होंगे, और ख़बरदार रहो कि कोई नफ़्ल क़ुबूल नहीं होता जब तक फ़र्ज़ अदा न कर लिया जाए।*

*ह़ुज़ूर पुर नूर सय्यिदुना ग़ौसे अअ़्ज़म رضی الله عنہ ने अपनी किताबे मुस्तत़ाब फ़ुतूह़ुल ग़ैब शरीफ़ में क्या क्या जिगर शिगाफ़ मिसालें ऐसे शख़्स़ के लिए इरशाद फ़रमाई हैं जो फ़र्ज़ छोड़ कर नफ़्ल बजा लाए फ़रमाते हैं उसकी कहावत ऐसी है जैसे किसी शख़्स़ को बादशाह अपनी ख़िदमत के लिए बुलाए, ये वहाँ तो ह़ाज़िर न हुवा और उसके ग़ुलाम की ख़िदमत गारी में मौजूद रहे।*

*ह़ज़रते सय्यिदुना अ़लिय्ये मुर्तज़ा رضی الله عنہ से इसकी मिसाल नक़ल इरशाद फ़रमाते हैं ऐसे शख़्स़ का ह़ाल उस औ़रत की त़रह़ है जिसे ह़मल रहा, जब बच्चा होने के दिन क़रीब आए (तो) इस्क़ात़ हो गया (इस्क़ात़े ह़मल यअ़्नी ह़ामिलह के पेट से बच्चे का वक़्त से पहले ख़ारिज हो जाना, गिर जाना) अब वोह न ह़ामिलह है न बच्चह वाली यअ़्नी जब पूरे दिनों पर अगर इस्क़ात़ हो तो मेह़नत तो पूरी उठाई और नतीजा ख़ाक नहीं कि अगर बच्चा होता तो समरह (नफअ़्, फ़ाइदह) ख़ुद मौजूद था ह़मल बाक़ी रहता तो आगे उम्मीद लगी थी, अब न ह़मल न बच्चा, न उम्मीद न समरह और तकलीफ़ वही झेली जो बच्चा वाली को होती।*

*उसी किताब में मौला अली رضی الله عنہ ने फ़रमाया है कि फ़र्ज़ छोड़ कर सुन्नत व नफ़्ल में मश्ग़ूल होगा यह क़ुबूल न होंगे।*

*इमाम शहाबुद्दीन सुहरवर्दी قدس سرہ अ़वारिफ़ शरीफ़ में ह़ज़रत ख़वास़ رضی الله عنہ से नक़ल फ़रमाते हैं हमें ख़बर पहुँची कि अल्लाह ﷻ कोई नफ़्ल क़ुबूल नहीं फ़रमाता यहाँ तक कि फ़र्ज़ अदा किया जाए, अल्लाह तआ़ला ऐसे लोगों से फ़रमाता है कहावत तुम्हारी बद बन्दह की मानिन्द है जो क़र्ज़ अदा करने से पहले तोह़फ़ह पेश करे।*

*ह़ुज़ूर पुरनूर सय्यिदे आ़लम ﷺ फ़रमाते हैं चार चीज़ें अल्लाह तआ़ला ने इस्लाम में फ़र्ज़ की हैं जो इन में से तीन अदा करे वोह उसे कुछ काम न दें जब तक पूरी चारों न बजा लाए नमाज़, ज़कात, रोज़ह रमज़ान, ह़ज्जे कअ़्बह*

*सय्यिदुना अ़ब्दुल्लाह बिन मस्ऊ़द رضی الله عنہ फ़रमाते हैं हमें ह़ुक्म दिया गया कि नमाज़ पढ़ें और ज़कात दें और जो ज़कात न दे उसकी नमाज़ क़ुबूल नहीं।*

*सुब्ह़ानल्लाह जब ज़कात न देने वाले की नमाज़, रोज़े, ह़ज तक मक़बूल नहीं तो उस नफ़्ल ख़ैरात नाम की काइनात से क्या उम्मीद है बल्कि उन्हीं से अस़्बहानी की रिवायत में आया कि फ़रमाते हैं जो नमाज़ अदा करे और ज़कात न दे वोह मुसलमान नहीं कि उसे उस का अ़मल काम आए।*

*किसी फ़ेअ़्ल (काम) का स़ह़ीह़ हो जाना और बात है और उस पर सवाब मिलना, मक़बूले बारगाह होना और बात है मस्लन अगर कोई शख़्स़ दिखावे के लिए नमाज़ पढ़े, नमाज़ स़ह़ीह़ तो हो गई फ़र्ज़ उतर गया, पर न क़ुबूल होगी न सवाब पाएगा, बल्कि उल्टा गुनहगार होगा, यही ह़ाल उस शख़्स़ का है।*
*📚 फ़तावा रज़विया शरीफ़, जिल्द 10, पेज 183 ता 186*



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