क़ज़ा नमाज़ों के कुछ ज़रूरी मसाइल

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*🥀 क़ज़ा नमाज़ों के कुछ ज़रूरी मसाइल 🥀*



*📣 क़ज़ा नमाज़ें नवाफ़िल से अहम हैं जिसके ज़िम्मह क़ज़ा नमाज़ें हों वोह पहले अपनी क़ज़ा नमाज़ें अदा करे फिर नफ़्ल नमाज़ें पढ़े क़ज़ा नमाज़ें पढ़ने के लिए कोई वक़्त मुक़र्रर नहीं उ़म्र में जब पढ़ेगा ज़िम्मह दारी से बरी हो जाएगा, मगर त़ुलूअ़् व ग़ुरूब और ज़वाल के वक़्त कि इन वक़्तों में कोई नमाज़ जाइज़ नहीं।*

*मस्अलह1:* बिला उ़ज़्रे शरई़ नमाज़ क़ज़ा कर देना बहुत सख़्त गुनाह है, उस पर फ़र्ज़ है कि उसकी क़ज़ा पढ़े और सच्चे दिल से तौबह करे, तौबह या ह़ज्जे मक़बूल से गुनाहे ताख़ीर मुआ़फ़ हो जाएगा।

*मस्अलह2:* तौबह जब ही स़ह़ीह़ है कि क़ज़ा पढ़ ले - उसको तो अदा न करे, तौबह किए जाए, येह तौबह नहीं कि वोह नमाज़ जो उसके ज़िम्मह थी उसका न पढ़ना तो अब भी बाक़ी है और जब गुनाह से बाज़ न आया, तौबह कहाँ हुई। 
*ह़दीस शरीफ़ में फ़रमाया:* गुनाह पर क़ाइम रह कर इस्तिग़फ़ार करने वाला उसके मिस्ल है जो अपने रब ﷻ से ठट्ठा (मज़ाक़) करता है।

*मस्अलह5:* जिस चीज़ का बन्दों पर ह़ुक्म है उसे वक़्त में बजा लाने को अदा कहते हैं और वक़्त के बअ़्द अ़मल में लाना क़ज़ा है और अगर उस ह़ुक्म के बजा लाने में कोई ख़राबी पैदा हो जाए तो दोबारह वोह ख़राबी दफ़अ़ करने के लिए करना इआ़दह है।

*मस्अलह6:* वक़्त में अगर तह़रीमह बाँध लिया तो नमाज़ क़ज़ा न हुई बल्कि अदा है - मगर नमाज़े फ़ज्र व जुमुअ़ह व ई़दैन कि इनमें सलाम से पहले भी अगर वक़्त निकल गया नमाज़ जाती रही।

*मस्अलह10:* फ़र्ज़ की क़ज़ा फ़र्ज़ है और वाजिब की क़ज़ा वाजिब और सुन्नत की क़ज़ा सुन्नत यअ़्नी वोह सुन्नतें जिनकी क़ज़ा है मस्लन फ़ज्र की सुन्नतें जब्कि फ़र्ज़ भी फ़ौत हो गया हो और ज़ुहर की पहली सुन्नतें जब्कि ज़ुहर का वक़्त बाक़ी हो।

*मस्अलह11:* क़ज़ा के लिए कोई वक़्त मुअ़य्यन (मुक़र्रर) नहीं उ़म्र में जब पढ़ेगा बरिउज़् ज़िम्मह हो जाएगा मगर तुलूअ़् व ग़ुरूब और ज़वाल के वक़्त कि इन वक़्तों में नमाज़ जाइज़ नहीं।

*मस्अलह15:* ऐसा मरीज़ कि इशारह से भी नमाज़ नहीं पढ़ सकता अगर येह ह़ालत पूरे 6 वक़्त तक रही तो इस ह़ालत में जो नमाज़ें फ़ौत हुईं उनकी क़ज़ा वाजिब नहीं।

*मस्अलह16:* जो नमाज़ जैसी फ़ौत हुई उसकी क़ज़ा वैसी ही पढ़ी जाएगी, मस्लन *सफ़र में नमाज़ क़ज़ा हुई तो* चार रकअ़्त वाली दो ही पढ़ी जाएगी अगर्चे इक़ामत की ह़ालत में पढ़े और ह़ालते इक़ामत में फ़ौत हुई तो चार रकअ़्त वाली की क़ज़ा चार रकअ़्त है अगर्चे सफ़र में पढ़े - अलबत्तह *क़ज़ा पढ़ने के वक़्त कोई उ़ज्र है तो* उसका एअ़्तिबार किया जाएगा, मस्लन जिस वक़्त फ़ौत हुई थी उस वक़्त खड़ा होकर पढ़ सकता था और अब क़ियाम नहीं कर सकता तो बैठ कर पढ़े या इस वक़्त इशारह ही से पढ़ सकता है तो इशारे से पढ़े और सेह़त के बअ़्द उसका इआ़दह नहीं।

*मस्अलह35:* जिस के ज़िम्मह क़ज़ा नमाज़ें हों अगर्चे उनका पढ़ना जल्द से जल्द वाजिब है मगर बाल बच्चों की ख़ूर्द व नोश (खाना पीना) और अपनी ज़रूरियात की फ़राहमी के सबब ताख़ीर जाइज़ है तो कारोबार भी करे और जो वक़्त फ़ुरस़त का मिले उसमें क़ज़ा पढ़ता रहे यहाँ तक कि पूरी हो जाएं।

*मस्अलह36:* क़ज़ा नमाज़ें नवाफ़िल से अहम हैं यअ़्नी जिस वक़्त नफ़्ल पढ़ता है उन्हें छोड़ कर उनके बदले क़ज़ाएं पढ़े कि बरिउज़् ज़िम्मह हो जाए अलबत्तह तरावीह़ और बारह रकअ़्तें सुन्नते मुअक्कदह कि न छोड़े।

*मस्अलह46:* क़ज़ाए उ़म्री कि शबे क़द्र या अख़ीरे जुमुअ़ए रमज़ान में जमाअ़त से पढ़ते हैं और येह समझते हैं कि उ़म्र भर की क़ज़ाएं इसी एक नमाज़ से अदा हो गईं, येह बात़िल मह़्ज़ है।

*👉 नोट-: क़ज़ा नमाज़ के बारे में ज़्यादह तफ़स़ील पढ़ने के लिए हमने यहाँ क़ज़ा नमाज़ से मुतअ़ल्लिक़ कुछ ज़रूरी मसाइल बहारे शरीअ़त ही से नक़्ल कर दिए हैं।*

*📚 बहारे शरीअ़त, जिल्द 1, ह़िस़्स़ह 4, पेज 699 से पेज 708*



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