शबे बारात या ग़फलत में सोने की रात

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*🥀 शबे बारात या ग़फलत में सोने की रात 🥀*



*शबे बारात वह रात नहीं है जिसे हमने बना लिया है, बल्कि वह रात है जिसे अल्लाह ने चुना है, मगर अफ़सोस हमने इसे इतना हल्का बना दिया कि अब यह सिर्फ़ एक तारीख़, एक रस्म और एक बहाना बनकर रह गई है, शाबान की पंद्रहवीं रात वह रात है जब अल्लाह तआला आसमान ए दुनिया पर तशरीफ़ लाता है और अपनी मख़लूक़ की तरफ़ रहमत की नज़र से देखता है, लेकिन सवाल यह है कि क्या हम उस नज़र के क़ाबिल भी हैं*

*हदीस में आता है कि इस रात अल्लाह तआला मुशरिक और दिल में कीना रखने वाले के सिवा सबको माफ़ कर देता है सोचो, सारी रात नमाज़ें पढ़ लो, दुआएँ कर लो, लेकिन अगर दिल में नफ़रत, जलन और दुश्मनी बैठी है तो मग़फ़िरत रुक जाती है। आज हम अल्लाह से माफी चाहते हैं, लेकिन बंदों को माफ़ करने को तैयार नहीं, और फिर कहते हैं दुआ कबूल क्यों नहीं होती, शबे-बारात वह रात है जिसमें आने वाले साल के फ़ैसले लिखे जाते हैं, कौन ज़िंदा रहेगा, कौन मिट्टी में उतरेगा, किसका रिज़्क़ खुलेगा, किस पर आज़माइश आएगी मौत का फ़ैसला भी इसी रात लिखा जाता है, लेकिन इंसान फिर भी सोया हुआ है, मानो उसे हमेशा ज़िंदा रहना है अगर सच में यक़ीन होता कि अगली शबे-बारात देखेंगे या नहीं, तो शायद आज की रात सोने में ज़ाया न होती*

*रसूलुल्लाह ﷺ इस रात में इबादत करते, रोते, दुआ करते और उम्मत के लिए मग़फ़िरत माँगते थे। कहीं नहीं मिलता कि आपने इस रात को शोर, आतिशबाज़ी, दिखावे या बेकार की महफ़िलों में बदला हो यह रात जश्न की नहीं, हिसाब की है, यह रात दूसरों को दिखाने की नहीं, अपने आप को अल्लाह के सामने गिराने की है कब्रिस्तान जाना सुन्नत है ताकि इंसान मौत को याद करे, लेकिन आज वहाँ भी तमाशा है, भीड़ है, बातें हैं, मोबाइल है, शबे-बारात का मक़सद डराना नहीं, जगाना है, यह कहना है कि आज तू क़ब्र के बाहर है, कल अंदर होगा, आज तौबा कर ले, कल मौका न मिले, यह रात हमें साफ़ कहती है कि अगर आज भी तेरा दिल नहीं पसीजा, तेरी आँख नहीं भीगी, और तेरा घमंड नहीं टूटा, तो फिर किसी और रात से क्या उम्मीद है*

*अल्लाह को हमारे बहाने नहीं चाहिए, उसे सच्चाई चाहिए, दिखावे की इबादत नहीं, टूटे हुए दिल की आह चाहिए शबे बारात को पटाखों से नहीं, पोस्टों से नहीं, बहसों से नहीं, बल्कि नमाज़, क़ुरआन, इस्तिग़फ़ार, तौबा और सच्ची दुआ से ज़िंदा करो अगर इस रात भी हम नहीं बदले, तो शायद हम बदलना ही नहीं चाहते, अल्लाह हमें इस रात की क़द्र समझने, बंदों के हक़ माफ़ करने, अपने गुनाहों से तौबा करने और आने वाले साल को अपनी रज़ा के मुताबिक़ जीने की तौफ़ीक़ दे.!*
 आमीन



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*🏁 MASLAKE AALA HAZRAT 🔴*

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